नवरात्र के दूसरे दिन जरूर पढ़े माँ ब्रह्मचारिणी की यह कथा

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आज चैत्र नवरात्रि का दूसरा दिन है। आप सभी जानते ही होंगे कि इस दिन मां ब्रह्मचारिणी की उपासना की जाती है। ऐसे में उनकी उपासना करते समय पीले अथवा सफेद वस्त्र धारण करना चाहिए। कहा जाता है मां को सफेद वस्तुएं अर्पित करें जैसे कि मिसरी, शक्कर या पंचामृत। इसी के साथ पूजा के समय ज्ञान और वैराग्य का कोई भी मंत्र जपा जा सकता है। कहा जाता है मां का ब्रह्मचारिणी रूप बेहद शांत, सौम्य और मोहक है। इसी के साथ ऐसी मान्यता है कि मां के इस रूप को पूजने से व्यक्ति को तप, त्याग, वैराग्य और सदाचार जैसे गुणों की प्राप्ति होती है। अब आज हम आपको बताने जा रहे हैं माँ ब्रह्मचारिणी की कथा।

माँ ब्रह्मचारिणी की कथा- पूर्वजन्म में माँ ब्रह्मचारिणी ने हिमालय के घर पुत्री रूप में जन्म लिया था और नारदजी के उपदेश से भगवान शंकर को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या की थी। इस कठिन तपस्या के कारण इन्हें तपश्चारिणी अर्थात्‌ ब्रह्मचारिणी नाम से अभिहित किया गया। एक हजार वर्ष तक इन्होंने केवल फल-फूल खाकर बिताए और सौ वर्षों तक केवल जमीन पर रहकर शाक पर निर्वाह किया। कुछ दिनों तक कठिन उपवास रखे और खुले आकाश के नीचे वर्षा और धूप के घोर कष्ट सहे। तीन हजार वर्षों तक टूटे हुए बिल्व पत्र खाए और भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद तो उन्होंने सूखे बिल्व पत्र खाना भी छोड़ दिए।

कई हजार वर्षों तक निर्जल और निराहार रह कर तपस्या करती रहीं। पत्तों को खाना छोड़ देने के कारण ही इनका नाम अपर्णा नाम पड़ गया। कठिन तपस्या के कारण देवी का शरीर एकदम क्षीण हो गया। देवता, ऋषि, सिद्धगण, मुनि सभी ने ब्रह्मचारिणी की तपस्या को अभूतपूर्व पुण्य कृत्य बताया, सराहना की और कहा- हे देवी आज तक किसी ने इस तरह की कठोर तपस्या नहीं की। यह तुम्हीं से ही संभव थी। तुम्हारी मनोकामना परिपूर्ण होगी और भगवान चंद्रमौलि शिवजी तुम्हें पति रूप में प्राप्त होंगे। अब तपस्या छोड़कर घर लौट जाओ। जल्द ही तुम्हारे पिता तुम्हें बुलाने आ रहे हैं। इस देवी की कथा का सार यह है कि जीवन के कठिन संघर्षों में भी मन विचलित नहीं होना चाहिए। मां ब्रह्मचारिणी देवी की कृपा से सर्व सिद्धि प्राप्त होती है।

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