बिलकिस मामले में दोषियों को सुप्रीम कोर्ट से मोहलत नहीं
नई दिल्ली, शुक्रवार, 19 जनवरी 2024। उच्चतम न्यायालय ने 2002 के गुजरात दंगों के दौरान बिलकिस बानो के साथ सामूहिक दुष्कर्म और उसके परिवार के सात लोगों की हत्या के दोषियों की आत्मसमर्पण करने के लिए समय बढ़ाने की उनकी याचिका शुक्रवार को खारिज कर दी। न्यायमूर्ति बी वी नागरत्ना और न्यायमूर्ति उज्ज्वल भुइयां की पीठ ने दोषियों की गुहार यह कहते हुए खारिज कर दी कि उनके आत्मसमर्पण के लिए मोहलत की मांग वाले आवेदनों में कोई 'ठोस आधार' नहीं है, जिससे उस पर विचार किया जा सके। शीर्ष अदालत ने कहा कि सभी दोषियों को 21 जनवरी को जेल प्रशासन के समक्ष आत्मसमर्पण करना होगा।
शीर्ष अदालत इस मामले के 11 दोषियों को गुजरात सरकार की माफी नीति के तहत दी गई सजा में छूट को आठ जनवरी को अवैध करार देते हुए उसे रद्द कर दिया था। इसके साथ ही, अदालत ने उन्हें जेल प्रशासन के समक्ष दो सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का आदेश दिया था, जिसकी अवधि 21 जनवरी को समाप्त होने वाला है। आत्मसमर्पण मे मोहलत की मांग करने वालों में शामिल दोषी रमेश रूपाभाई चंदना ने पारिवारिक दायित्व निभाने के लिए छह सप्ताह की मोहलत मांगी थी, जबकि दोषी मितेश चिमनलाल भट ने सर्दियों की उपज की कटाई के लिए छह सप्ताह का और समय देने की गुहार लगाई थी। एक अन्य दोषी ने अपने बूढ़े और बीमार पिता की देखभाल के लिए छह सप्ताह का अतिरिक्त समय की विनती की थी।
उच्चतम न्यायालय 2002 के गुजरात दंगों के दौरान बिलकिस बानो के साथ सामूहिक दुष्कर्म और उनके परिवार के सात सदस्यों की हत्या मामले में अजीवन कारावास की सजा काट रहे 11 दोषियों की 2022 में समयपूर्व रिहाई के गुजरात सरकार के फैसले को अवैध करार देते हुए आठ जनवरी को रद्द कर दिया था। न्यायमूर्ति नागरत्ना और न्यायमूर्ति भुइयां की पीठ ने अपने फैसले में कहा था कि इस मामले में सजामाफी के मुद्दे पर फैसला लेना गुजरात सरकार के अधिकारक्षेत्र में नहीं आता, इसलिए सजामाफी देने का सरकार का फैसला रद्द किया जाता है।
पीठ ने कहा था कि मुकदमे की सुनवाई महाराष्ट्र की अदालत में हुई थी, इसलिए सजामाफी का फैसला लेना वहां की सरकार के अधिकारक्षेत्र में आता है। गुजरात सरकार की 1992 की माफी नीति के तहत बाकाभाई वोहानिया, जसवंत नाई, गोविंद नाई, शैलेश भट्ट, राधेश्याम शाह, विपिन चंद्र जोशी, केशरभाई वोहानिया, प्रदीप मोढ़वाडिया, राजूभाई सोनी, मितेश भट्ट और रमेश चांदना को 15 अगस्त 2022 को गोधरा उप कारागर से रिहा कर दिया गया था। रिहा करने के फैसले को बिलकिस और अन्य की ओर से अदालत में चुनौती दी गई थी।
शीर्ष अदालत ने बिलकिस और अन्य की याचिकाओं पर सुनवाई पूरी होने के बाद 12 अक्टूबर 2023 को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था। याचिकाकर्ताओं ने उम्र कैद की सजा पाए दोषियों को समय से पूर्व रिहा करने के गुजरात सरकार के फैसले को गलत बताते हुए इसे चुनौती दी थी। शीर्ष अदालत ने सुनवाई के दौरान कहा था कि अपराध भयानक है, लेकिन वह ''भावनाओं में'' नहीं आएगी और केवल कानून के आधार पर इस मामले में फैसला करेगी। अदालत ने तब यह भी कहा था कि गुजरात सरकार इस मामले में अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करेगी, क्योंकि वहां अपराध हुआ था। बिलकिस ने नवंबर 2022 में अदालत का दरवाजा खटखटाया। अपनी याचिका में उन्होंने दलील दी थी कि यह 'सबसे भयानक अपराधों में से एक था।' एक विशेष समुदाय के प्रति नफरत से प्रेरित अत्यधिक अमानवीय हिंसा और क्रूरता थी।
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