समुद्रयान के जरिये गहरे समुद्र में अन्वेषण करेगा भारत
चेन्नई, गुरुवार, 20 नवंबर 2025। अगले वर्ष की शुरुआत में एक शीर्ष समुद्री संस्थान के दो वैज्ञानिक चेन्नई अपतटीय क्षेत्र में 28 टन वजनी स्वदेशी मानवयुक्त पनडुब्बी (सबमर्जिबल) को 500 मीटर की गहराई तक ले जाएंगे। इसके साथ ही भारत उन चुनिंदा देशों के प्रतिष्ठित समूह में शामिल हो जाएगा जिनके पास ऐसा करने की क्षमता है। राष्ट्रीय महासागर प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईओटी) के जल यात्री रमेश राजू और जतिंदर पाल सिंह भारत के ‘डीप ओशन मिशन’ के तहत गहरे महासागर के रहस्यों को जानने के लिए ‘मत्स्य-6000’ का संचालन करेंगे।
एनआईओटी के निदेशक बालाजी रामकृष्णन ने यहां ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘हमने दूर से संचालित यानों का उपयोग करके समुद्र तल की गहराई में अन्वेषण किया है। यह पहली बार है जब हम 6,000 मीटर की गहराई में मनुष्यों को भेज रहे हैं और इस मिशन के लिए सुरक्षा सर्वोपरि है।’’ पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के नेतृत्व वाली भारत की समुद्रयान परियोजना को आत्मनिर्भरता की भावना का भी प्रतिबिंब माना जा रहा है। मानव के साथ गहरे समुद्र में जा सकने वाली पनडुब्बी खरीदने के लिए दो बार वैश्विक निविदाएं जारी की गईं, लेकिन प्रौद्योगिकी उपलब्ध नहीं होने के कारण सरकार को इस पोत को देश में ही विकसित करना पड़ा।
रामकृष्णन ने कहा, ‘‘हमने इसे एक चुनौती के रूप में लिया। हमारे पास गहरे समुद्र में गोता लगाने की विशेषज्ञता तो थी लेकिन केवल 1000 मीटर तक। जब हमने परियोजना शुरू की और संबंधित प्रयोगशालाओं का दौरा करना आरंभ किया तो पता चला कि देश के भीतर ही डीआरडीओ (रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन) और सीएसआईआर (वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद) की प्रयोगशालाओं तथा इसरो (भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन) के संस्थानों में आवश्यक विशेषज्ञता और प्रौद्योगिकी उपलब्ध हैं।’’ वैज्ञानिकों का मानना है कि समुद्र की गहराइयों में अन्वेषण के लिए मानव को भेजना नयी खोजों की संभावनाओं को कई गुना बढ़ा देता है क्योंकि वे मौके पर ही निर्णय लेने में सक्षम होते हैं। समुद्रयान परियोजना के निदेशक एस. नारायणन ने ‘पीटीआई-भाषा’ से कहा, ‘‘कोई कैमरा मानव नेत्र की बराबरी नहीं कर सकता। उसकी दृष्टि और समझ बिल्कुल भिन्न होती है जो समुद्र तल के बारे में गहन जानकारियां प्रदान करेगी।’’
गहरे समुद्र में खनिज, ईंधन एवं जैवविविधता संसाधन मौजूद हैं और केवल अमेरिका, रूस, चीन, जापान एवं फ्रांस जैसे कुछ ही देशों के पास इतनी गहराई में अन्वेषण करने की क्षमता है। ‘समुद्रयान’ परियोजना की सफलता के साथ भारत भी इन चुनिंदा देशों के समूह में शामिल हो जाएगा। ‘मत्स्य-6000’ पनडुब्बी अगले वर्ष की शुरुआत में वैज्ञानिकों को सबसे पहले 500 मीटर की गहराई तक ले जाएगी। यही वह अधिकतम गहराई है जहां तक नौसेना की पनडुब्बियां संचालित होती हैं। भारतीय वैज्ञानिक 2027 में उससे दस गुना अधिक गहराई में गोता लगाने की योजना बना रहे हैं। उसी वर्ष इसरो ‘गगनयान’ मिशन के तहत भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में ले जाने का प्रयास करेगा।
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