चाबहार बंदरगाह परियोजना पर स्थिति स्पष्ट करे सरकार : कांग्रेस
नई दिल्ली, रविवार, 15 मार्च 2026। कांग्रेस ने कहा है कि ईरान में स्थित चाबहार बंदरगाह इस दौरान परिदृश्य में नहीं है और इसका अदृश्य होना सरकार की कूटनीति के लिए और बड़ा झटका है। कांग्रेस संचार विभाग के प्रभारी जयराम रमेश ने सोशल मीडिया एक्स पर रविवार को लिखा कि सरकार को चाबहार परियोजना को लेकर स्थिति स्पष्ट कर बताना चाहिए कि क्या भारत अब भी इस परियोजना में शामिल है। उनका उनका कहना था कि अगर ऐसा नहीं है तो यह भारत के लिए बड़ा रणनीतिक झटका है। उन्होंने सवाल करते हुए पूछा कि इस परियोजना में स्थिति क्या है या क्या फिलहाल उसके निवेश संबंधी दायित्व पूरे हो चुके हैं। चाबहार के परिदृश्य में नहीं होना पश्चिम एशिया कूटनीति में भारत के लिए दूसरा रणनीतिक झटका दिखता है। ताजिकिस्तान के अयनी के वायुसेना अड्डे को भारत पहले ही बंद कर चुका है।
कांग्रेस नेता ने इस परियोजना की स्थिति को लेकर सरकार पर सवाल उठाए और कहा कि शासन में निरंतरता एक बुनियादी सच्चाई है, जिसे प्रधानमंत्री कभी स्वीकार नहीं करते। परियोजना के बारे में उन्होंने लिखा कि 1990 के दशक के उत्तरार्ध से ही भारत ने भारत-अफगानिस्तान-ईरान सहयोग रणनीति के तहत ईरान के चाबहार बंदरगाह में निवेश की संभावनाओं की तलाश शुरू की थी । तेहरान में आयोजित 16वें गुटनिरपेक्ष शिखर सम्मेलन में भाग लेने के बाद डॉ. मनमोहन सिंह ने इन योजनाओं को नई गति दी और मई 2013 में कैबिनेट ने चाबहार में प्रारंभिक तौर पर 11.5 करोड़ डॉलर के निवेश को मंजूरी दी। यह फैसला उस समय लिया गया था, जब भारत अक्टूबर 2008 में हस्ताक्षरित भारत-अमेरिका परमाणु समझौते को लागू करने के लिए बड़े कदम उठा रहा था।
उन्होंने कहा कि फिर अक्टूबर 2014 में मोदी सरकार ने डॉ. मनमोहन सिंह की चाबहार पहल को रीपैकेज किया और उसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की परिकल्पना का हिस्सा बताकर पेश किया। 2026-27 के बजट में चाबहार के लिए कोई आवंटन नहीं किया गया। कांग्रेस नेता ने सवाल किया और कहा "क्या इसका मतलब यह है कि भारत इस परियोजना से बाहर हो गया है, या फिलहाल उसके निवेश संबंधी दायित्व पूरे हो चुके हैं। किसी भी स्थिति में, पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह-जिसे चीन ने बनाया है-से लगभग 170 किलोमीटर पश्चिम स्थित चाबहार अब परिदृश्य में दिखाई नहीं दे रहा है। यह भारत की पश्चिम एशिया कूटनीति के लिए दूसरा रणनीतिक झटका है, क्योंकि इससे पहले भारत ताजिकिस्तान के दुशांबे के पास अयनी में स्थित अपने वायुसेना अड्डे को बंद कर चुका है।
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