अष्ट चिरंजीवियों में से एक हैं कृपाचार्य, जानिए उनका जन्म की कथा

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कृपाचार्य ने ही कौरव और पांडवों को नैतिक ज्ञान, कूटनीति और राजनीति की शिक्षा दी थी। कहा जाता है ये हस्तिनापुर के कुलगुरु थे और इनको अष्ट चिरंजीवियों में से एक माना जाता है, इसका मतलब है कि ऐसी मान्यता है कि ये आज भी जीवित हैं। जी दरअसल महाभारत के अनुसार, रुद्र के एक गण ने कृपाचार्य के रूप में अवतार लिया था। कहते हैं कुरुक्षेत्र के युद्ध में इन्होंने कौरवों का साथ दिया था और कौरवों की सेना में जो अंतिम 3 लोग बचे थे, कृपाचार्य भी उन्हीं में से एक थे। आप सभी को यह भी बता दें कि 13 जुलाई, बुधवार को गुरु पूर्णिमा है। ऐसे में हम आपको बताने जा रहे हैं कृपाचार्य के जन्म की कथा।

कृपाचार्य के जन्म की कथा- महाभारत के अनुसार, गुरु कृपाचार्य के पिता का नाम शरद्वान था, वे महर्षि गौतम के पुत्र थे। महर्षि शरद्वान ने घोर तपस्या कर देवताओं से दिव्य अस्त्र प्राप्त किए और धनुर्विद्या में निपुणता प्राप्त की। यह देखकर देवराज इंद्र भी घबरा गए और उन्होंने शरद्वान की तपस्या तोड़ने के लिए जानपदी नाम की अप्सरा भेजी, जिसे देखकर महर्षि शरद्वान का वीर्यपात हो गया। उनका वीर्य सरकंड़ों पर गिरा, जिससे वह दो भागों में बंट गया। उससे एक कन्या और एक बालक उत्पन्न हुआ। वही बालक कृपाचार्य बना और कन्या कृपी के नाम से प्रसिद्ध हुई। भीष्म के पिता राजा शांतनु ने कृपाचार्य और उनकी बहन कृपी का पालन-पोषण किया था।

युद्ध में दिया था कौरवों का साथ- वहीं महाभारत के अनुसार, हस्तिनापुर के कुलगुरु होने के नाते इन्होंने युद्ध में कौरवों का साथ दिया। जी हाँ और इस दौरान इन्होंने पांडवों के कई योद्धाओं का वध भी किया। वहीं युद्ध समाप्त होने के बाद जब अश्वत्थामा ने रात में धोखे से द्रौपदी के पुत्रों का वध किया था, उस समय कृतवर्मा के साथ-साथ कृपाचार्य भी बाहर पहरा दे रहे थे। उसके बाद इन तीनों ने ही ये बात जाकर दुर्योधन को बताई थी। वहीं दुर्योधन की मृत्यु के बाद अश्वत्थामा, कृपाचार्य और कृतवर्मा अलग-अलग हो गए।

अष्ट चिरंजीवियों में से एक हैं कृपाचार्य- 
गुरु कृपाचार्य अमर है। इस बात का प्रमाण ये श्लोक है-

अश्वत्थामा बलिव्र्यासो हनूमांश्च विभीषण:।
कृप: परशुरामश्च सप्तएतै चिरजीविन:॥
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद्वर्षशतं सोपि सर्वव्याधिविवर्जित।।
अर्थात- अश्वत्थामा, राजा बलि, महर्षि वेदव्यास, हनुमानजी, विभीषण, कृपाचार्य, परशुराम व ऋषि मार्कण्डेय- ये आठों अमर हैं।

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