गोवत्स द्वादशी व्रत 23 अगस्त को, इस विधि से करें पूजन

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संतान सुख के लिए रखे जाने व्रत में वत्स द्वादशी का व्रत भी शामिल है। जी हाँ और वत्स द्वादशी का पर्व भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को मनाया जाता है और इस पावन पर्व के अवसर पर गाय और बछड़े की पूजा की जाती है। जी दरअसल इस साल वत्स द्वादशी 23 अगस्त को है और हिंदू धार्मिक पुराणों में सभी तीर्थ गौमाता में है और ऐसा माना जाता है कि गौ माता के दर्शन मात्र से ऐसा पुण्य फल मिलता है, जो बड़े-बड़े यज्ञ, दान आदि करने से भी प्राप्त नहीं होता। आपको बताते हैं गोवत्स द्वादशी व्रत की पूजन विधि।

गोवत्स द्वादशी व्रत की पूजन विधि- सबसे पहले सुबह-सुबह नहा धो कर स्वच्छ वस्त्र पहन कर तैयार हो जाएं। उसके बाद दूध देने वाली गाय और बछड़े के पास जाएं। अब गाय को व बछड़े को शुद्ध पानी से नहला कर तैयार कर ले। फिर उन्हें वस्त्र से फूल माला आदि से सजा ले फिर उनके सींग को भी सजा लें। उसके बाद गाय को व बछड़े को रोली का टीका करें। अब चावल के स्थान पर बाजरा से टीका लगाएं। इसके बाद गाय को मक्के बाजरे से बनी हुई रोटी व बेसन से बनी हुई चीजें खिलाएं।

अब गाय के बछड़े को भी भोजन खिलाए अंकुरित अनाज चना मोठ मूंग मटर जैसी चीजें ही खिलाएं। इसके बाद गेहूं व चावल से बने हुए पदार्थ बिल्कुल ना खिलाए ना खाएं यह वर्जित है। ध्यान रहे इस दिन गाय के दूध से बनी हुई पदार्थ भी वर्जित है यह दिन सिर्फ भैंस के दूध से बनी हुई चीजें इस्तेमाल की जाती है। अब भोजन खिलाने के बाद गाय के चरणों की धूल से तिलक करें। वैसे अगर आपके पास गाय या बछड़ा नहीं है या आपके आस पास भी कहीं नहीं मिल रही है तो बछवारस कैलेंडर ले ले या ( बछवारस पाटा) बना ले।

उसके बाद कथा सुने। हालाँकि ध्यान रहे कथा सुनते वक्त बाजरा अपने हाथ में लेकर रखें। वहीं कथा जब खत्म हो जाए तो अपनी सास का आशीर्वाद अवश्य लें उन्हें एक कटोरी में भीगा हुआ चना मोठ व कुछ रुपए रख कर दें व उनका पैर छूकर आशीर्वाद लें। अब इसके बाद अपने पुत्र को पूजा का एक लड्डू दें वह उनको तिलक लगाएं व नारियल दे और शाम को जब गाय चारा खा कर वापस आए तो उसके बाद भी गाय की पूजा करें।

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