न्यायाधीश ने चीनी वीजा से जुड़े मामले में कार्ति चिदंबरम की याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग किया
नई दिल्ली, शुक्रवार, 23 जनवरी 2026। दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश न्यायमूर्ति गिरीश कथपालिया ने शुक्रवार को कथित चीनी वीजा घोटाले से जुड़े मामले में कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम की उस याचिका पर सुनवाई से खुद को अलग कर लिया जिसमें उन्होंने अपने खिलाफ भ्रष्टाचार और साजिश के आरोपों को चुनौती दी है। केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) इस मामले की जांच कर रहा है। न्यायमूर्ति कथपालिया ने कहा, "मुझे नहीं लगता कि मैं इस मामले की सुनवाई कर पाऊंगा।" न्यायाधीश ने आदेश दिया कि व्यक्तिगत कारणों से इस मामले को किसी अन्य पीठ के समक्ष सूचीबद्ध किया जाए।
मामले की अगली सुनवाई 28 जनवरी को होगी। इससे पहले, उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति स्वर्ण कांत शर्मा और न्यायमूर्ति अनूप जे. भंभानी ने भी इस मामले की सुनवाई से खुद को अलग कर लिया था। न्यायमूर्ति शर्मा ने 15 जनवरी को निर्देश दिया था कि मामले को किसी अन्य पीठ के समक्ष रखा जाए। न्यायमूर्ति भंभानी ने भी 19 जनवरी को इसी तरह का आदेश दिया। सीबीआई ने अक्टूबर 2024 में कार्ति चिदंबरम और अन्य आरोपियों के खिलाफ 2011 में तलवंडी साबो पावर लिमिटेड (टीएसपीएल) नाम की एक बिजली कंपनी के लिए चीन के नागरिकों को वीजा दिलाने में कथित रिश्वतखोरी के आरोप में आरोपपत्र दायर किया था। उस समय कार्ति चिदंबरम के पिता पी. चिदंबरम केंद्रीय गृह मंत्री थे।
एक अधीनस्थ न्यायालय ने 23 दिसंबर, 2025 को इस मामले में कार्ति चिदंबरम और छह अन्य लोगों के खिलाफ आपराधिक साजिश और भ्रष्टाचार के आरोप तय करने का आदेश दिया था।अदालत ने कहा था कि प्रथम दृष्टया तत्कालीन भारतीय दंड संहिता की धारा 120 बी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा आठ और नौ (लोक सेवक पर व्यक्तिगत प्रभाव डालने के लिए रिश्वत लेना) के तहत कार्ति चिदंबरम के खिलाफ आरोप तय करने के लिए पर्याप्त सबूत मौजूद हैं। शिवगंगा से लोकसभा सदस्य ने उच्च न्यायालय में दायर अपनी याचिका में कहा कि अधीनस्थ न्यायालय ने रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री व दस्तावेजों पर न्यायिक विवेक का प्रयोग नहीं किया क्योंकि अदालत ने उन दस्तावेजों, सबूतों और गवाहों के बयानों को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया, जो अपराध की अनुपस्थिति को दर्शाते हैं।
याचिका में बताया गया कि जांच एजेंसी द्वारा लगाए गए आरोपों के अनुसार न तो कोई रिश्वतखोरी हुई और न ही कोई षड्यंत्र रचा गया। सीबीआई ने 2022 में दर्ज प्राथमिकी के आधार पर दो साल की जांच के बाद आरोपपत्र दाखिल किया था। प्राथमिकी में आरोप लगाया गया था कि पंजाब स्थित टीएसपीएल 1980 मेगावाट का तापीय विद्युत संयंत्र स्थापित कर रही थी और इसका काम चीन की कंपनी 'शेडोंग इलेक्ट्रिक पावर कंस्ट्रक्शन कॉर्प' (एसईपीसीओ) को आउटसोर्स किया गया था। परियोजना निर्धारित समय से पीछे चल रही थी और कंपनी पर जुर्माना लगने की आशंका थी।
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