रेतीली पगडंडी से रैम्प की चमक तक: तानों को कामयाबी से जवाब देकर कामना ने बढ़ाया मारवाड़ का मान
- मिस ग्लैम राजस्थान 2026 की ब्रांड एंबेसडर बनीं कुंडल की बेटी कामना राजपुरोहित, अब अंतरराष्ट्रीय मंच का है सपना
पादरू (भगाराम), गुरुवार, 16 अप्रैल 2026। कहते हैं कि अगर इरादे मजबूत हों तो मंजिलें खुद-ब-खुद रास्ता दे देती हैं। इस बात को सच कर दिखाया है बालोतरा जिले की पंचायत समिति पादरू क्षेत्र के छोटे से गांव कुंडल की बेटी कामना राजपुरोहित ने। तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई की मॉडर्न और चकाचौंध भरी जीवनशैली में रची-बसी कामना को कोरोना महामारी वापस अपने पिता की जन्मभूमि मारवाड़ की रेतीली धरती पर ले आई। मेट्रो सिटी की पढ़ाई, खुले विचार और शहरी पहनावे की वजह से जब कामना कुंडल पहुंची तो गांव में उसके लिबास और जीवनशैली पर तानों की बौछार शुरू हो गई। जींस-टॉप पहनने पर रिश्तेदारों ने बातें बनाईं, पड़ोसियों ने चरित्र पर सवाल उठाए। लेकिन उन तानों से टूटने के बजाय कामना ने उन्हें अपनी ताकत बनाया। आज वही कामना 'मिस ग्लैम राजस्थान 2026' की ब्रांड एंबेसडर बनकर पूरे मारवाड़ का नाम रोशन कर रही है। उसकी इस कामयाबी ने ताने देने वालों के मुंह पर खुद-ब-खुद ताला लगा दिया है।
*चेन्नई में पला रुपहले पर्दे का सपना*
कामना का जन्म चेन्नई में हुआ। वहीं पली-बढ़ी और स्कूली शिक्षा पूरी की। महानगर के खुले माहौल में रहते हुए बचपन से ही उसका झुकाव बॉलीवुड की रंगीन दुनिया की तरफ था। डांस के स्टेप्स, सिंगिंग के सुर और एक्टिंग के एक्सप्रेशन - इन तीनों में कामना की जान बसती थी। लेकिन शर्मीले स्वभाव के कारण वह अपने इस बड़े सपने के बारे में परिवार में किसी से खुलकर बात नहीं कर पाती थी। चेन्नई में किशोरावस्था की दहलीज पर कदम रख ही रही थी कि साल 2020 में कोरोना महामारी ने उसकी जिंदगी की दिशा ही बदल दी।
*कोविड बना टर्निंग पॉइंट, गांव ने दी नई चुनौती*
लॉकडाउन और बदली आर्थिक परिस्थितियों के चलते कामना को पूरे परिवार के साथ पैतृक गांव कुंडल शिफ्ट होना पड़ा। एसी कमरों और मॉल कल्चर से सीधे गांव की तपती रेत और कच्चे रास्तों पर आना कामना के लिए किसी सदमे से कम नहीं था। यहां आकर उसे पहली बार एहसास हुआ कि 21वीं सदी में भी ग्रामीण भारत के कई हिस्सों में लड़कियों को लेकर सोच कितनी संकीर्ण और रूढ़िवादी है।
कामना बताती हैं, "गांव में मेरे कपड़ों को लेकर इतनी बातें बनीं कि कई बार घर से निकलने का मन ही नहीं करता था। रिश्तेदार ताने मारते थे कि शहर से आई है, बिगड़ गई है।" उसके गांव-परिवार में लड़कियों की ज्यादा पढ़ाई का कोई चलन नहीं था। सपने देखना तो दूर, स्कूल भेजना भी बड़ी बात मानी जाती थी। ऐसे माहौल में कामना खुद को बहुत भाग्यशाली मानती हैं कि उसके माता-पिता, खासकर पिता जबरसिंह राजपुरोहित एक चट्टान की तरह उसके साथ खड़े रहे।
*पिता का भरोसा बना सबसे बड़ा हथियार*
जब पूरा गांव बेटी के पहनावे पर सवाल उठा रहा था, तब जबरसिंह राजपुरोहित ने समाज की परवाह न करते हुए कहा, "मेरी बेटी पढ़ेगी भी और आगे भी बढ़ेगी।" उन्होंने कड़ा संघर्ष करके कामना को 11वीं और 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के लिए जोधपुर के हॉस्टल में भेजा। यह कामना की जिंदगी का पहला बड़ा टर्निंग पॉइंट था।
जोधपुर से 12वीं करने के बाद भी कामना के मन में ग्लैमर की दुनिया का क्रेज कम नहीं हुआ। लेकिन गांव में न कोई कोचिंग, न कोई अकादमी, न कोई गाइड। कुंडल में बिताए गए अगले 3 सालों में कामना ने हार नहीं मानी। उसने अपने घर के एक छोटे से कमरे को ही अपना स्टेज, अपना रैम्प और अपना स्टूडियो बना लिया। यूट्यूब को अपना उस्ताद बनाया। घंटों-घंटों मोबाइल पर फैशन शो, मिस इंडिया कॉन्टेस्ट, एक्टिंग वर्कशॉप के वीडियो देखकर मॉडलिंग की परफेक्ट वॉक, डांस के प्रोफेशनल स्टेप्स और एक्टिंग की बारीकियां खुद सीखीं। शीशे के सामने घंटों प्रैक्टिस करती, गिरती, फिर उठती।
*जयपुर की अकेली जंग और पहला मुकाम*
बेटी का जुनून और समर्पण देखकर पिता जबरसिंह ने परिवार के लिए सबसे मुश्किल फैसला लिया। उन्होंने कामना और उसके तीनों भाई-बहनों को करियर बनाने के लिए जयपुर शिफ्ट कर दिया, जबकि वे खुद पत्नी के साथ गांव में ही खेती संभालते रहे। जयपुर जैसे अनजान शहर में चारों भाई-बहन बिल्कुल अकेले। न कोई रिश्तेदार, न कोई जानकार।
मॉडलिंग की फील्ड में मार्गदर्शन देने वाला कोई नहीं था। कामना सोशल मीडिया पर खुद ही ऑडिशन सर्च करती, ऑनलाइन फॉर्म भरती और अकेले ही बस या ऑटो पकड़कर दूर-दूर तक ऑडिशन देने जाती। कई बार रिजेक्शन मिले। कई बार किराये के पैसे भी पूरे नहीं पड़ते थे। कई बार "अगली बार आना" सुनकर खाली हाथ लौटना पड़ा। लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी।
आखिरकार मिस इंडिया ग्लैम के ऑडिशन में उसका चयन हो गया। वहां तीन महीने की कड़ी ट्रेनिंग और मेहनत के बाद भले ही वह मुख्य खिताब नहीं जीत पाईं, लेकिन ज्यूरी उनके अभिनय और आत्मविश्वास से इतनी प्रभावित हुई कि उन्हें 'मिस इंडिया ग्लैम बेस्ट एक्टर' के अवॉर्ड से नवाजा गया। यह कामना की पहली बड़ी राष्ट्रीय पहचान थी।
*ब्रांड एंबेसडर बनकर रचा इतिहास*
मिस इंडिया ग्लैम के बाद कामना ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। अगले तीन महीनों में उन्होंने अपने टैलेंट, अनुशासन और मेहनत से फैशन इंडस्ट्री में अपनी अलग पहचान बना ली। इसी का नतीजा रहा कि हाल ही में उन्हें प्रतिष्ठित स्टेट लेवल ब्यूटी पेजेंट 'मिस ग्लैम राजस्थान 2026' का ब्रांड एंबेसडर चुना गया।
गांव की रेतीली पगडंडियों से निकल कर रैम्प की चमक-दमक तक पहुंचने वाली कामना के लिए यह किसी सपने के सच होने जैसा है। इस उपलब्धि पर उन्हें पुरस्कार स्वरूप एक स्कूटी और एक भव्य समारोह में हजारों लोगों के सामने सम्मानित किया गया। मंच पर जब कामना का नाम अनाउंस हुआ तो उसकी आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। सम्मान लेते समय उसने सबसे पहले अपने पिता जबरसिंह राजपुरोहित का नाम लिया और कहा, "अगर आज मैं यहां खड़ी हूं तो सिर्फ अपने बाबुल की वजह से।"
*गांव में जश्न का माहौल, अब अंतरराष्ट्रीय सपना*
कामना की इस कामयाबी की खबर जैसे ही कुंडल पहुंची, गांव में जश्न का माहौल बन गया। वही लोग जो कभी ताने मारते थे, आज गर्व से उसका नाम ले रहे हैं। कामना बताती हैं कि वह अपने गांव, अपने मारवाड़ को सकारात्मक ऊर्जा और आधुनिक सोच के साथ आगे बढ़ता देखना चाहती हैं।
"मेरा मकसद सिर्फ रैम्प पर चलना नहीं है। मैं उस मुकाम पर पहुंचना चाहती हूं जो गांव की हर बेटी के लिए नजीर बने। मैं बताना चाहती हूं कि बेटियां बोझ नहीं, बेशकीमती होती हैं," कामना भावुक होकर कहती हैं।
कामना के मुताबिक हर बेटी अपने सपनों को पूरा कर सकती है, बशर्ते उसका 'बाबुल' जबरसिंह राजपुरोहित जैसा हो, जो समाज से लड़कर भी बेटी का साथ दे। अब कामना की नजर अंतरराष्ट्रीय ब्यूटी पेजेंट पर है। वह मारवाड़ और मरुधरा की संस्कृति को ग्लोबल मंच पर ले जाना चाहती हैं।
कुंडल की तपती रेत से निकलकर इंटरनेशनल रैम्प तक का सपना देखने वाली कामना राजपुरोहित आज लाखों लड़कियों की प्रेरणा बन चुकी हैं।
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