उच्चतम न्यायालय ने ‘नकदी के बदले नौकरी’ घोटाले में द्रमुक के पूर्व मंत्री नेहरू की याचिका खारिज की
नई दिल्ली, सोमवार, 02 नवम्बर 2026। उच्चतम न्यायालय ने सोमवार को तमिलनाडु के पूर्व मंत्री और द्रमुक नेता के. एन. नेहरू की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने 634 करोड़ रुपये के ‘नकदी के बदले नौकरी’ संबंधी कथित घोटाले में उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने के मद्रास उच्च न्यायालय के निर्देश को चुनौती दी थी। न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और न्यायमूर्ति शील नागू की पीठ ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा कि उच्च न्यायालय के 20 फरवरी के फैसले और 26 अक्टूबर के आदेश में हस्तक्षेप करने का कोई आधार नहीं है।
उच्च न्यायालय ने 26 अक्टूबर को नेहरू की पुनर्विचार याचिका खारिज कर दी थी। इस याचिका में उन्होंने उच्च न्यायालय के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें 634 करोड़ रुपये के ‘नकदी के बदले नौकरी’ संबंधी कथित घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की ओर से दी गई जानकारी के आधार पर सतर्कता एवं भ्रष्टाचार निरोधक निदेशालय (डीवीएसी) को मामला दर्ज करने का निर्देश दिया गया था।अदालत ने राज्य सरकार की पुनर्विचार याचिका भी खारिज कर दी थी, जिसने मामले से खुद को अलग कर लिया था। यह मामला उस समय नकदी के बदले नौकरी देने के आरोपों से जुड़ा है, जब तमिलनाडु में 2021 से 2026 तक द्रविड़ मुनेत्र कषगम (द्रमुक) सरकार के दौरान तिरुचिरापल्ली के प्रभावशाली नेता नेहरू नगर प्रशासन एवं जल आपूर्ति विभाग के प्रमुख थे।
पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए उच्च न्यायालय की पीठ ने अपने आदेश में कहा था कि इस मामले में दो बातें उसके संज्ञान में हैं… पहली, अदालत ने चार फरवरी 2026 को अपना आदेश सुरक्षित रख लिया था और उसे 20 फरवरी 2026 को सुनाया था। इस तरह आदेश सुनाए जाने में दो सप्ताह से अधिक का अंतर था। यह स्वीकार किया गया है कि नोटिस मिलने के बाद यदि पुनर्विचार याचिकाकर्ता अदालत के संज्ञान में कोई बात लाना चाहता था, तो 16 दिन की इस अवधि में उसे आवेदन दाखिल करने से किसी ने नहीं रोका था। लेकिन उसने ऐसा कोई प्रयास नहीं किया। पीठ ने कहा कि यह बात मूल रूप से महाधिवक्ता की इस दलील को सही ठहराती है कि पुनर्विचार याचिकाकर्ता ने कार्यवाही के दौरान चुप्पी साधे रखी और बाद में शिकायत की।
इसने कहा कि दूसरी बात यह है कि अदालत ने केवल मामला दर्ज करने और जांच करने का निर्देश दिया था, इससे अधिक कुछ नहीं। आदेश में कहा गया था कि अदालत ने किसी को दोषी नहीं ठहराया था और उस स्तर पर ऐसा कर भी नहीं सकती थी। आदेश में की गई टिप्पणियां प्रवर्तन निदेशालय के मामले को दर्ज करती हैं, न कि इस पर अदालत का कोई निष्कर्ष। जांच में यह पता लगाया जाना था कि ईडी की ओर से जुटाई गई सामग्री सही साबित होती है या नहीं और क्या पुनर्विचार याचिकाकर्ता या उसके रिश्तेदारों की कथित गतिविधियों में कोई भूमिका थी। इसके बाद इन सवालों पर आपराधिक अदालत को फैसला करना था।
उच्च न्यायालय की पीठ ने कहा कि मामला दर्ज करने और जांच करने का निर्देश अपने स्वभाव से ही एक शुरुआती कदम था, जिससे किसी की दोषसिद्धि तय नहीं होती और न ही इसके लिए उन सभी लोगों का पक्ष सुनना जरूरी है, जिनकी जांच आगे चलकर हो सकती है। पीठ ने कहा कि जांच जब याचिकाकर्ता तक पहुंचेगी, तब उसे अपना पक्ष पूरी तरह रखने का अवसर मिलेगा।
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